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Monday, 30 March 2020

Woh Shahar Mera

वो शहर मेरा 




दिन रात चलती सड़क थी वहां,
भागती फिरती थी दुनिया,
बुजुर्गो की पुकारे थी,
बच्चों की सिसकियाँ,
पर में कैसे रुकूँ?
में कैसे रुक सकता हूँ?
मैंने ही तो अपने कंधे पर दुनिया उठाई है...

लो रुक गयी आज दुनिया,
रुक गया मेरा शहर,
रुक गयी सड़कें,
थम गया मशीनों का कहर,
बदल गया है वह शहर मेरा,
जो मेरे बिना ना चलता था। 

मैं तो घर पर हूँ,
सुना है खाकी चला रही है उसे,
एक नयी दिशा दिखा रही है उसे; 
एक नयी दिशा दिखा रही है उसे।