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Monday, 2 July 2012

Mithaas

मिठास..

यूँ शाम को चाय के प्याले से गपशप हो गयी 
मीठा तो डाला था मैंने, फिर मिठास कहाँ खो गयी ?
प्याला जैसे मुस्कुरा उठा, मुझ पर ही झला उठा,
बोला मिठास मुझसे नहीं जिन्दगियों से गायब है,
आधुनिकता के इस दौर में मिठास की क्या कीमत है?
अगर पहचान है तुझे मिठास के गुणों की ...
जा जाकर ढून्ढ ला उसे दबे हुए अरमानों से,
बचपन के उस भोलेपन से,पुराने किन्ही मकानों से,
माँ की रसोई से, गाँव के खलियानों से,
परियों की कहानी से, उन खोये हुए ज़मानो से,
ढून्ढ कर बाँट देना उसे सब जाने-अनजानों में,
जिंदगियां फिर मीठी हो जाएँगी और मिठास ही है बांटने से बड़ जाएगी,
बांटने से बड़ जाएगी .......