चली में उड़ चली,
नए सपनो की ओर,
छोड़ पराया देश
अपने घर, अपनों की ओर,
पर घर तो था ही नहीं,
अपनों का भी पता नहीं,
पडोसी कुछ जाने पहचाने थे,
मेरे पास आये मिलने के बहाने से,
ना जाने क्यूँ मुझको देख रहे थे,
ना जाने क्या मुझमे देख रहे थे,
मैं भी खड़ी थी बेहाल सी,
उनके सामने सवाल सी,
थोड़े झिझके ;थोड़े ठिठके,
आखिर में फिर हिम्मत कर बोले,
बम फटा था, गोलियां चली थी,
यही मोहल्ला, यही गली थी,
दुश्मन कौन था नहीं पता,
पर मेरे अपनों की थी क्या खता,
शायद की वो उस देश के वासी है;
जिससे जलाने की सज़ा सिर्फ जेल,
बचाने की सज़ा फांसी है,
अज़ाद कराने की सज़ा फांसी है.....
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